गुरुवार, 19 मार्च 2009

दरारें.....!

रिश्तोंमे पड़ीं, दरारें इतनी,
के, मर्रम्मत के क़ाबिल नही रही,
छूने गयी जहाँ भी, दीवारें गिर गयीं...
क्या खोया, क्या मिट गया,या दब गया,
इस ढेर के नीचे,कोई नामोनिशान नहीं....
कुछ थाभी या नही, येभी पता नही...
मायूस खडी देखती हूँ, मलबा उठाना चाहती हूँ,
पर क्या करुँ? बेहद थक गयी हूँ !
लगता है, मानो मै ख़ुद दब गयी हूँ...
अरे तमाशबीनों ! कोई तो आगे बढो !
कुछ तो मेरी मदद करो, ज़रा हाथ बटाओ,
यहाँ मै, और कुछ नही, सफ़ाई चाहती हूँ...!!
फिर कोई बना ले अपना, महेल या झोंपडा,
उसके आशियाँ की ये हालत ना हो,
जी भर के दुआएँ देना चाहती हूँ...!!

सारी पुकारें मेरी हवामे उड़ गयीं...
कुछेक ने कहा, ये है तेरा किया कराया,
खुद्ही समेट इसे, हमें क्यों बुलाया ?

2 टिप्‍पणियां:

  1. रिश्तोंमे पड़ीं, दरारें इतनी,
    के, मर्रम्मत के क़ाबिल नही रही,

    बहुत खूब लिखा है,
    I can only add to say that,
    "दिल है के मेरा ,जैसे एक खाली मकान है,
    ज़रजर तो हो गया है मगर आलीशान है!"

    "हैं हवाएं भी सर्द, और अन्धेरा भी घना,
    शम्मा चाहे कि नहीं उसे हर हाल में जलना होगा!"
    To read the complete गज़ल do visit www.sachmein.blogspot.com

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  2. kaaphi achhi kavita hai... aapaki kavitaaon me kuchh naya dekhane ko milata hai ...jaari rakhe...

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