शुक्रवार, 20 मार्च 2009

विनाशकाले विपरीत बुद्ध्ही.

आज नीरज जी कविता पढ़ आयी...सच का जो दम भरते हैं...उनके बारेमे सच सुनतेही तिलमिला उठ ते हैं....!कितना सच है....

पोहोचीं किसीके पनाहमे,एक कोमलांगी,
नयी, किरण थी, दुनियादारीसे अनजान थी,
सुबह एक भिक्षुक आया, कुछ दान दे देवी,
उससे कहने लगा, कहके के अभी आयी,
वो रोटी लाने अन्दर गयी, पीछेसे आवाज़ आयी,
कह दे, घरमे कुछ नही ,कह नही सकती?
पर घरमे तो रोटी...खामोश, घरमे कुछ नही!
वो भरमा गयी, वो कहाँ आ गयी थी?

जैसे, जैसे दिन बीते, बात समझमे आने लगी,
वो सुकुमार भोली, झूठके डेरेमे, पोहोंची थी
बंदिशोंकी ऊंची, ऊँची दीवारें थी, कितनी घुटन थी!
चाहा कि कुछ ताज़गी पाए, उसने इजाज़त पूछी,
ना, ना, यहाँ ये चलन नही, तुम अभी समझी नही?
तू इन्हें पार नही कर सकती,आनेके पेहेले सोंच लेती?
इस बातको बरसों बीते, उसकी तो तब मत मारी गयी थी॥
क्या नाम दें उस नादानीको,विनाशकाले विपरीत बुद्धी !!
शमा

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