शुक्रवार, 19 जून 2009

मुकम्मल जहाँ ...

मैंने कब मुकम्मल जहाँ माँगा?
जानती हूँ नही मिलता!
मेरी जुस्तजू ना मुमकिन नहीं !
अरे, पैर रखनेको ज़मीं चाही
पूरी दुनिया तो नही माँगी?

2 टिप्‍पणियां:

  1. मुकम्मल जहाँ से मांगी भी तो पैर रखने की जगह, वाह बहुत खूब ............

    तीखा और सच्चा व्यंग

    चन्द्र मोहन गुप्त

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