रविवार, 21 जून 2009

दरख़्त ऊँचे थे...

तपती गरमीमे देखे थे,
अमलतास गुलमोहर
साथ खडे,पूरी बहारपे!
देखा कमाल कुदरत का,
घरकी छयामे खडे होके!
तपती गरमी मे देखे...

हम तो मुरझा गए थे
हल्की-सी किरण से!
बुलंद-ए हौसला कर के
खडे हुए धूप मे जाके!
तपती गरमी देखे...

वो थे करिश्मे खुदाके,
हम थे ज़मीं के ज़र्रे !
कैसे बराबरी हो उनसे ?
वो हमसे कितने ऊँचे थे!
तपती गरमी मे देखे...

आसमाँ छूती बाहों के,
साए शीतल, घनेरे,
कैसे भूँले,जिनके तले,
हम महफूज़ रह, पले थे!
तपती गरमी मे देखे थे...

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर भाव प्रदर्शन

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  2. दरख़्त थे खुदा के करिश्मे!
    हम थे ज़मीं के ज़र्रे थे!
    कैसे बराबरी हो उनसे ?
    वो हमसे कितने ऊँचे थे!
    तपती गरमी मे देखे...

    bahut achchhi rachna.

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