शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

वो घर बुलाता है....

वो घर बुलाता है...

जब,जब पुरानी तस्वीरे
कुछ याँदें ताज़ा करती हैं ,
हँसते हँसते भी मेरी
आँखें भर आती हैं!
वो गाँव निगाहोंमे बसता है
फिर सबकुछ ओझल होता है,
घर बचपन का मुझे बुलाता है,
जिसका पिछला दरवाज़ा
खालिहानोमें खुलता था ,
हमेशा खुलाही रहता था....

वो पेड नीमका आँगन मे,
जिसपे झूला पड़ता था!
सपनोंमे शहज़ादी आती थी ,
माँ जो कहानी सुनाती थी!
वो घर जो अब "वो घर"नही,
अब भी ख्वाबोमे आता है
बिलकुल वैसाही दिखता है,
जैसाकि वो अब नही!

लकड़ी का चूल्हाभी दिखता है,
दिलसे धुआँसा उठता है,
चूल्हातो ठंडा पड़ गया
सीना धीरे धीरे सुलगता है,
बरसती बदरीको मै
बंद खिड्कीसे देखती हूँ
भीगनेसे बचती हूँ....

"भिगो मत"कहेनेवाले
कोयीभी मेरे पास नही
तो भीगनेभी मज़ाभी नही।
जब दिन अँधेरे होते हैं
मै रौशन दान जलाती हूँ
अँधेरेसे कतराती हूँ
पास मेरे वो गोदी नही
जहाँ मै सिर छुपा लूँ
वो हाथभी पास नही
जो बालोंपे फिरता था
डरको दूर भगाता था....

खुशबू अब भी है आती
जब पुराने कपड़ों मे पडी
सूखी मोलश्री मिल जाती
हर सूनीसी दोपहरमे
मेरी साँसों मे भर जाती,
कितना याद दिला जाती ,
नन्ही लडकी सामने आती
जिसे आरज़ू थी बडे होनेके....

जब दिन छोटे लगते थे,
जब परछाई लम्बी होती थी,
यें यादे कैसी होती?
कडी धूपमे ताजी रहती है !
ये कैसे नही सूखती?
ये कैसे नही मुरझाती ?
ये क्या चमत्कार है?

पर ठीक ही है जोभी है,
चाहे वो रुला जाती है,
दिलको सुकूनभी पहुँचाती,
बातेँ पुरानी होकेभी,
लगती हैं कलहीकी
जब पीली तसवीरें,
मेरे सीनेसे चिपकती हैं......

जब होठोंपे मुस्कान खिलती है
जब आँखें रिमझिम झरती हैं
जो खो गया ढूँढे नही मिलेगा,
बात पतेकी मुझहीसे कहती हैं ....
जब, जब पुरानी तस्वीरें,
कुछ यादेँ ताज़ा करती हैं...
हँसते, हँसते भी ,
मेरी आँखें भर आती हैं...

1 टिप्पणियाँ:

NirjharNeer ने कहा…

जो खो गया ढूंढें नही मिलेगा

marmsparshi chitran
bhavnaoN ka ataah gahra sagar.

..
aapne jo shabd likhe hai meri rachnaoN par vo ta_um'r sahejne ki chiij hai,
mai apni sari rachnaoo ka poorn swamitv aapko deta hun ni:sankoch aap jo chahe kareN. ye meri khushkismatii hogi kahin kisi roj mere shabd mujhse achanak takra jaye.

khaksaar ki zarra_navazii ka shuk'rguzaar rahungaa.aapki khushi ki mangal kaamna karta hun.

1 टिप्पणी:

  1. जब, जब पुरानी तस्वीरें,
    कुछ यादेँ ताज़ा करती हैं...
    हँसते, हँसते भी ,
    मेरी आँखें भर आती हैं.
    Ho bhi kyon na apna rishta jo unse juda hua hai.samay bhale hi tivra gati se badal raha hai par jo bahvnayein man mein basi hain unhein badalne mein waqt to lagega hi.
    Achchhi kavita hai.
    Navnit Nirav

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