मंगलवार, 11 अगस्त 2009

चश्मे नम मेरे....

हैं परेशाँ , चश्मे नम मेरे,
इन्हें, लमहा, लमहा,
रुला रहा है कोई.....

चाहूँ थमना चलते, चलते,
क़दम बढ्तेही जा रहें हैं,
सदाएँ दे रहा है कोई.....

अए चाँद, सुन मेरे शिकवे,
तेरीही चाँदनी बरसाके,
बरसों, जला रहा कोई......

शमा

13 टिप्‍पणियां:

  1. shamaji,
    " pahle ye batao ki aapke dimag me ye sab aata kahan se hai ...bahut hi gaherai bhari baat saral bhasa me hum sab ke samne rakh diya aapne thanx"

    -----eksacchai {AAWAZ}

    http://eksacchai.blogspot.com

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  2. तेरीही चाँदनी बरसाके,
    बरसों, जला रहा कोई......
    बेहतरीन अभिव्यक्ति

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  3. अच्छी लगी ये कविता मेरे ब्लॉग पर आने के लिए धनयवाद भी स्वीकार करें

    उसी के कारन मुझे आप को पढ़ने का अवसर मिला

    abhee naya hoon blog ke jagat men dekhata hoon word verification kahan se aya hai hata doonga

    Anil masoomshayer

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  4. आपकी बहुत सारी कवितायेँ पढने के बाद मुझे मजबूर होकर कहना पढ़ रहा है कि
    ""जब दिल के बात कह तो सभी दर्द मत उन्ढेल
    वरना कहेंगे लोग ग़ज़ल है कि मर्सिया

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  5. aapke sabhi bhav itne sunder hote hai,achcha lagta hai aapke blog par aaker shubhkamnayen

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  6. अच्छी कविता है
    पर लगा कुछ कमी रह गयी

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  7. अए चाँद, सुन मेरे शिकवे,
    तेरीही चाँदनी बरसाके,
    बरसों, जला रहा कोई......

    main kya kahoon? ab? bahut hi achchi kavita.........

    aapse maafi chahta hoon.....deri se aane ke liye......

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  8. अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...
    मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग "मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी"में पिरो दिया है।
    आप का स्वागत है...

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  9. हैं परेशाँ , चश्मे नम मेरे,
    इन्हें, लमहा, लमहा,
    रुला रहा है कोई....


    exceelent

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  10. हैं परेशाँ , चश्मे नम मेरे,
    इन्हें, लमहा, लमहा,
    रुला रहा है कोई.....

    चाहूँ थमना चलते, चलते,
    क़दम बढ्तेही जा रहें हैं,
    सदाएँ दे रहा है कोई.....

    अए चाँद, सुन मेरे शिकवे,
    तेरीही चाँदनी बरसाके,
    बरसों, जला रहा कोई......
    bahut khoob adbhut ahsaas liye

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  11. बहुत खूब लिखा आपने | आपकी कविता पर कुछ कहना चाहूँगा के

    कर अहद ज़िन्दगी से
    ग़म छोड़ मुस्कराओ अब तो
    अश्कों के सैलाब बहाने में
    वो सुकून कहाँ
    जो हंसी में डूब जाने में है

    तमाशा-ए-ज़िन्दगी



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