बुधवार, 1 जुलाई 2009

वो महकी कली थी....

शबनम धुली थी,मेहकी कली थी,
पंखुडी नाज़ुक, खुलने लगी थी,
मनके द्वारोंपे दस्तक हुई थी,
वो चाहत किसीकी बनी थी!
शबनम धुली थी ....

बिछुड्नेवाली थी उसकी वो डाली,
जिसपे वो जन्मी,पली थी,
उसे कुछ खबरही नही थी,
पीकी दुनिया सजाने चली थी,
शबनम धुली थी.. ...

बेसख्ता वो झूमने लगी थी,
पुर ख़तर राहोंसे बेखबर थी
वो राह प्यारी, वो मनकी सहेली,
हाथ छुडाये जा रही थी,
शबनम धुली थी.....

कहता कोई उससे कि पड़ेगी,
सबसे जुदा,वो बेहद अकेली,
तो कली, सुननेवाली नही थी!
पलकोंमे ख्वाबोंकी झालर बुनी थी!
शबनम धुली, वो मेहकी कली थी,
वो सिर्फ़ मेहकी कली थी.....

"एक बार फिर दुविधा..",इस मालिका में इसे लिख चुकी हूँ...एक कड़ी की शुरुआत इस रचनासे की थी...

7 टिप्‍पणियां:

  1. शमा जी ,
    मेरे ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद आपकी टिप्पणी आयी पढ़कर अच्छा लगा .शुक्रिया .आपकी कविताओं में तो प्रकृति,संवेदनाएं ,सरल भाषा सभी कुछ है ...अच्छी हैं आपकी कवितायेँ.
    हेमंत कुमार

    उत्तर देंहटाएं
  2. Ap to sundar likhti hain..kabhi ham bachhon ke liye bhi likhen.

    Mere Blog par bhi ayen aur meri new pic. dekhen.

    उत्तर देंहटाएं
  3. ख़ूबसूरत भाव संजोये हैं आपने इसमे.

    उत्तर देंहटाएं
  4. खुबसूरत भावों से ओतप्रोत सुन्दर गीत.
    बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपके रिदम बनाने का मैं कायल हूँ. बहुत सुन्दर कविता. जारी रहें.

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी रचना माँ पड़ी ,माँ की खूब याद आ गई . जाने कैसे यह "वह महकी कली थी " खुल गया । बहुत अच्छा लगा । बधाई

    उत्तर देंहटाएं