शनिवार, 20 दिसंबर 2008

उनके नज़ारे

जिनके नज़ारोंके लिए
हम तरसते रहे,
जब हुए वो नज़ारे
इतने डरावने हुए
उफ़ !कहते ना बने!
सोंचा था चारागर वो है
पुराने,जाने पहचाने
ज़ख्मोंपे मरहम करेंगे!
वो तो हरे घावोंपे
और खरोंचे दे गए!

निवेदन लेखिकाकी ओरसे: इस लेखन का कहीं भी दूसरी जगह बिना इजाज़त इस्तेमाल ना करें। ये कानूनन जुर्म है।

22 टिप्‍पणियां:

  1. Sajeev chitran hai aur arth bhi spast hain. Hum manushya hain.Hum to keval wahi dekh sakte hain jo humain dikhta hai.kuchh chijein humari najron aur hamari soch se pare hoti hain.Jo kuchh anubhavon ke baad hi samajh main aa sakati hain.
    achhi kavita ke liye dhanywad.

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  2. bahut sundar rachana ..
    ye lines bahut acchi hai ..
    ......वो तो हरे घावोंपे
    और खरोंचे दे गए!....

    aur likhe ..

    bahut badhai

    maine bhi kuch naya likha hai .. dekhiyenga

    vijay
    poemsofvijay.blogspot.com v

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  3. First of all Wish u Very Happy New Year...

    App ki rachna me app ki man ki gahrai se nikali appki komal bhav shabdo me puri tarah se ghal gaye hai .. badhai...

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  4. nice 2 see ur creation...likhte jayein...kasam se dard k ehsas me jo maza hai, wo khushiyan k daman me kaha...

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  5. dard ki intehaa...
    dard ki shikayat...
    dard ka muqadass izhaar...
    dard se jurha saadiq rishtaa...
    dard ki be-jorh tarjumaani.....
    Nazm bahot achhi hai, sirf mubarakbaad kahu to
    km jaan parhtaa hai, phir bhi ...
    mubarakbaad qubool farmaaeiN .

    ---MUFLIS---

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  6. बहुत अच्छी बात लिखी है /नजारों को तरसते थे दिखाई दिए तो डरने लगे /जिनसे उम्मीद थी कि मरहम लगायेंगे वे जख्मों को कुरेद गए ,गनीमत रही नमक नहीं छिड़का /बहुत कड़वे अनुभवों की अभिव्यक्ति /कभी कभी ऐसे कड़वे अनुभव न होने पर होने भी साहित्यकार लिख दिया करते हैं यही साहित्य की विशेषता है

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  7. mujhe-e-jaanekarar
    tum meri taqdir lagti ho
    har haal me tum mujhe
    vafa ki tasvir lagti ho
    mohabbat ki manjil
    ko pa lene ki
    E sanam tum mujhe
    saral tadbir lagti ho

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  8. tumhari makhmur nigahon ne
    ikraj mujhse kah diya
    jo baaton se na kah saki
    tumhari ankho ne kah diya,
    tum ek gulabi kanval ho
    aarizon ne kah diya
    tum ek umadti ghata ho
    tumhari julfon ne kah diya

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  9. वो तो हरे घावोंपे
    और खरोंचे दे गए!

    ना जाने क्या सोचते हम पहले
    वो ज़िंदगी को नयी सोचें दे गए

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  10. ''स्वामी विवेकानंद जयंती'' और ''युवा दिवस'' पर ''युवा'' की तरफ से आप सभी शुभचिंतकों को बधाई. बस यूँ ही लेखनी को धार देकर अपनी रचनाशीलता में अभिवृद्धि करते रहें.

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  11. मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ
    मेरे तकनीकि ब्लॉग पर आप सादर आमंत्रित हैं

    -----नयी प्रविष्टि
    आपके ब्लॉग का अपना SMS चैनल बनायें
    तकनीक दृष्टा/Tech Prevue

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  12. bahut hi achhi kavita hai, Dil ke andar ki uthal-puthal jhalakti hai aapki is akvita me ek dard ke saath.

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  13. kavi ya kavitri ka kaam dard dena nahin balki dard ko sametkar doosaron ko khushi dena hai. doosaron ko raah dikhana. apna dharm nibhayen.rachna mein koi n koi seekh honi chahiye. rachnaon mein koi sandesh hona chahiye.meri samalochana par gaur karen.God bless you.

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  14. jakhmo par marham karege socha tha ,ghawon par aur kharoche de gaye. bahut sandar.

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  15. शमा जी
    जिस सलीक़े से आपने विषयानुसार अपने ब्लॉग्स का विभाजन किया है वह अनुकरणीय है। मैंने आपके सभी चिट्ठों को नहीं पढ़ा लेकिन आपकी प्रोफ़ाइल पर जो सूचि है उससे आपके चरित्र की प्रबंधन क्षमता का परिचय मिलता है।
    अपेक्षा है कि आप हर ब्लॉग पर निरंतर कुछ नया उपलब्ध कराती रहेंगी।
    "कितना" से कहीं महत्त्वपूर्ण होता है "कैसा"!

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  16. मेरे चिट्ठे ^ सदविचार ^ पर आपने अनुरोध किया था कि, मै अपने ब्लॉग से शब्द पुष्टिकरन हटा लूँ, मुझे इसके बारे में नहीं पता.
    मै नया ब्लोग्गर हूँ. शब्द पुष्टिकरन क्या होता है. मै नही जानता. इस बारे में जानकारी कहाँ से मिल सकता है. आपको जानकारी हो; यदि सम्भव हो तो अवगत कराने का कृपा करें.

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  17. मूल्यवान विचार एवं अभिव्यक्ति ..धन्यवाद ..

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