सोमवार, 16 मार्च 2009

चिडिया गर चुग जाए खेत....

चिड़िया ग़र चुग जाये खेत....


सुना था मेरे बडोसे
चिड़िया ग़र चुग जाये
खेत,फायदा नही रोनेसे!
ये कहावत चली आयी
गुजरती हुई सदियोसे
ना भाषाका भेद
ना किसी देशकाही
खेत बोए गए,
पंछी चुगते गए
लोग रोते रहे
इतिहास गवाह है
सिलसिला थमा नही
चलताही रहा
चलताही रहा !

एक बगिया बनाएँ...

"जब एक बूँद नूरकी,
भोलेसे चेहरे पे किसी,
धीरेसे है टपकती ,
जब दो पंखुडियाँ नाज़ुक-सी,
मुस्काती हैं होटोंकी,
वही तो कविता कहलाती!

क्यों हम उसे गुनगुनाते नही?
क्यों बाहोंमे झुलाते नही?
क्यों देते हैं घोंट गला?
क्यों करतें हैं गुनाह ऐसा?
ऐसा, जो काबिले माफी नही?
फाँसी के फँदेके सिवा इसकी,
अन्य कोई सज़ा नही??

किससे छुपाते हैं ये करतूते,
अस्तित्व जिसका चराचर मे,
वो हमारा पालनहार,
वो हमारा सर्जनहार,
कुछभी छुपता है उससे??
देखता हजारों आँखों से!!
क्या सचमे हम समझ नही पाते?

आओ, एक बगीचा बनायें,
जिसमे ये नन्हीं कलियाँ खिलाएँ,
इन्हें स्नेह्से नेहलायें,
महकेगी जिससे ज़िंदगी हमारी,
महक उठेगी दुनियाँ सारी...
मत असमय चुन लेना,
इन्हें फूलने देना,
एक दिन आयेगा ऐसा,
जब नाज़ करोगे इन कलियोंका......"

मंगलवार, 10 मार्च 2009

शमा, अपनेही मज़ारकी.....

शमा, अपनेही मज़ारकी.....


रुसवाईयों से कितना डरें, के,
डर के सायेमे जीते हैं हम !
या कि रोज़ मरते हैं हम ?
लिख डाला आपने दीवारों तकपे,
उसे तो मिटाभी सकते हैं हम...
आख़िर कबतक यही करेंगे हम?
डरके ही सायेमे दम तोडेंगे हम?
ये रौशनी नही उधारकी,
सदियोंसे अपनेही मज़ारपे,
जलते हुए चराग हैं हम....

जो दाग ,दामने दिलपे मिले,
वो मरकेभी न मिटा पाएँगे,
सोचते हैं, मूँदके अपनी आँखे,
काश! ये होता,वो ना होता,
गर ऐसा होता तो कैसा रहता....
जब कुछ नही बदल सकते हैं हम,
हरपल डरके सायेमे रहते हैं हम.....

बचीं हैं चंद आखरी साँसे,
अब तो हटा लो अपने साए ,
के कबसे तबाह हो चुके हैं हम....
याद रखना, गर निकलेगी हाय,
खुदही मिट जायेंगे आप,
बून्दभी पानीकी न होगी नसीब,
इसतरह तड़प जायेंगे आप,
डरके साए बन जायेंगे हम...

वैसे तो मिट ही चुके हैं,
हमें मिटानेकी तरकीबें करते,
क्या करें, कि, अपने गिरेबाँ मे
झाँक नही सकते हो तुम?
सब्रकी इन्तेहा हो गयी है,
अब खबरदार हो जाओ तुम,
पीठ मे नही, ख़ंजर,अब,
सीनेमे पार कर सकते हैं हम,
कबतक डरके रह सकते हैं हम?
अपनेही मज़ारका दिया हैं हम...

शमा

रविवार, 8 मार्च 2009

ना ख़ुदा ने सताया.....

ना खुदाने सताया...

ना खुदाने सताया
ना मौतने रुलाया
रुलाया तो ज़िन्दगीने
माराभी उसीने
ना शिकवा खुदासे
ना गिला मौतसे
थोडासा रेहेम माँगा
तो वो जिन्दगीसे
वही ज़िद करती है,
जीनेपे अमादाभी
वही करती है...
मौत तो राहत है,
वो पलके चूमके
गेहेरी नींद सुलाती है
ये तो ज़िंदगी है,
जो नींदे चुराती है
पर शिकायतसे भी
डरती हूँ उसकी,
गर कहीँ सुनले,
पलटके एक ऐसा
तमाचा जड़ दे
ना जीनेके काबिल रखे
ना मरनेकी इजाज़त दे....
शमा

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

चराग के सायेमे....

चराग के सायेमे .......

एक मजरूह रूह दिन एक
उड़ चली लंबे सफ़र पे,
थक के कुछ देर रुकी
वीरानसी डगर पे ।
गुज़रते राह्गीरने देखा उसे
तो हैरतसे पूछा उसे,
'ये क्या हुआ तुझे?
ये लहूसा टपक रहा कैसे ?
नीरसा झर रहा कहाँसे?'
रूह बोली,'था एक कोई
जल्लाद जैसे के हो तुम्ही
पँख मेरे कटाये
हर दिन रुलाया,
दिए ज़खम्भी कई,
उस क़ैद से हू उड़ चली!
था रौशनी ओरोंके लिए,
बना रहनुमा हज़ारोंके लिए
मुझे तो गुमराह किया,
उसकी लौने हरदम जलाया
मंज़िलके निशाँ तो क्या,
गुम गयी राहभी!
किरनके लिए रही तरसती
ना जानूँ कैसे बीती,
काली,रातें अंधेरी,
कितने दिन बीते,
युग बीते याकि?
गिनती हो ना सकी
काले स्याह अंधेरेमे !
चल,जा,छोड़ मत छेड़ मुझे,
झंकार दूँ छूनेसे तेरे,
ऐसी बीनाकी तार नही!
ग़र गुमशुदगीके मेरे
चर्चे तू सुने
कहना ,हाँ,मिली थी
रूह एक थकी हारी ,
साथ कहना येभी,
मैंने कहा था,मेरी
ग़ैर मौजूदगी
हो चर्चे इतने,
इस क़ाबिल थी कभी?
खोजोगे मुझे,
कैसे,किसलिये?
मेरा अता ना पता कोई,
सब रिश्तोंसे दूर चली,
सब नाते तोड़ चली!
बरसों हुए वजूद मिटे
बात कल परसों की तो नही...

जल उठी "शमा"

Tuesday, July 22, 2008

जल उठी" शमा....!"

शामिले ज़िन्दगीके चरागों ने
पेशे खिदमत अँधेरा किया,
मैंने खुदको जला लिया,
रौशने राहोंके ख़ातिर ,
शाम ढलते बनके शमा!
मुझे तो उजाला न मिला,
पर सुना, चंद राह्गीरोंको
थोड़ा-सा हौसला ज़रूर मिला....
अब सेहर होनेको है ,
ये शमा बुझनेको है,
जो रातमे जलते हैं,
वो कब सेहर देखते हैं?
शमा

शायद आइन्दा ज़्यादा लगन से लिख पाउंगी...अब तो कुछ ज़रूरी कामोने घेर रखा है,जो नज़रंदाज़ नही किए जा सकते!!

6 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari said...

अब सेहर होनेको है ,
ये शमा बुझनेको है,
जो रातमे जलते हैं,
वो कब सेहर देखते हैं?


--बहुत उम्दा रचना...बधाई..

अनुराग said...

अब सेहर होनेको है ,
ये शमा बुझनेको है,
जो रातमे जलते हैं,
वो कब सेहर देखते हैं?

बहुत बड़ी बात कह गयी आप.....सारा सार यही छिपा है

डा० अमर कुमार said...

=^..^=

मोह्तरमा,
ग़र बदतमीज़ी में शुमार न हो, तो अर्ज़ करूँ ?

चंद हरुफ़ों व नुक्तों में रद्दोबदल की ग़ुंज़ाइश मालूम होती है,
इस सफ़े पर नमूदार होने वाला हर कोई उर्दूदाँ तो न होगा । मसलन चराघों को चराग़ों वा सेहर को सहर के तौर पर नुमाँया किया जाता, तो बेहतर तरीके से दिल तक पहुँचने की सूरत बन जाती !

vipinkizindagi said...

achcha likha hai

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

"मैंने खुदको जला लिया,
रौशने राहोंके खातिर ,
शाम ढलते बनके शमा!
मुझे तो उजाला न मिला,
पर सुना, चंद राह्गीरोंको
थोड़ा-सा हौसला ज़रूर मिला...."
बहुत प्रेरक पंक्तियाँ है। आप आगे भी इसी प्रकार राहों को रौशन करती रहें, यही कामना है।

दीपक said...

"मैंने खुदको जला लिया,
रौशने राहोंके खातिर ,

बहुत सुंदर दील को छुने वाली रचना !! आभार

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

पहलेसे उजाले....

Monday, June 4, 2007

पहलेसे उजाले...

छोड़ दिया देखना कबसे
अपना आईना हमने!
बड़ा बेदर्द हो गया है,
पलट के पूछता है हमसे
कौन हो,हो कौन तुम?
पहचाना नही तुम्हे!
जो खो चुकी हूँ मैं
वही ढूंढता है मुझमे !
कहाँसे लाऊँ पहलेसे उजाले
बुझे हुए चेहरेपे अपने?
आया था कोई चाँद बनके
चाँदनी फैली थी मनमे
जब गया तो घरसे मेरे
ले गया सूरज साथ अपने!

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